|| ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवी- तुवरण्यम भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचो- दयात् || ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवी- तुवरण्यम भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचो- दयात् || ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवी- तुवरण्यम भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचो- दयात् ||
Top

आचार्य देवव्रत संदेश

।। उद्द्मेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।।

आचार्य देवव्रत
सन्देश

गुरुकुल शिक्षा आधुनिक युग में उस अनुपम निधि के समान है , जिसकी दुयुति से परिवार, समाज, राष्ट्र व विश्व चमत्कृत होता है | संस्कारों व अनुशासन की भट्ठी मे छात्र कुंदन की तरह तैयार होकर समाज- व्यवस्था मे अपने दिव्य गुण स्वावलम्बन व स्वाभिमान की नींव रखता है |
आधुनिक युग भौतिकवादी है , इसमे नित बढ़ते आपराधिक मामले, नृशंश हत्याएं , नशाखोरी , भ्रष्टाचार व अपने कर्तव्यों के प्रति विमुखता की गर्म हवाएं प्रखर रूप में प्रवाहमान हो रही हैं| ऐसे में छात्रों की रक्षा हेतु गुरुकुल शिक्षा पदधति ही 'रक्षा - कवच ' है | किसी भी राष्ट्र के भविष्य निर्माता अगर सच्चे गुरुजन हैं तो उनके आदर्शों को समाज में फलीभूत करने का पूरा श्रये इन युवाओं को है | युवा ही प्रत्येक राष्ट्र के 'कर्णधार' होते हैं | इनके बाजुओं में ही आमूल-चूक परिवर्तन की क्षमता सन्निहित होती है | अवार्चीन युग में द्रुत गति से शिक्षा का स्वरूप रूपांतरित हुआ है | इस प्रतियोगिता के दौर में गुरुकुलीय शिक्षा को अद्धतन करते हुए छात्रों का सर्वांगीण विकास हो रहा है | अवार्चीन व प्राचीन शिक्षा का अनूठा समिश्रण जहाँ एक ओर छात्रों में माता - पिता की सेवा , गुरुजनो का आदर , राष्ट्र के प्रति अनुराग, संस्कृति का पोषण , परहित चिंतन जैसे अनुपम गुणों का सतत विकास करती है, वहीँ दूसरी ओर आधुनिक शिक्षा के प्रारूप को आत्मसात करती हुई छात्र को 'प्रतियोगी युग ' में अग्रणीय भी बनाती है |