|| ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवी- तुवरण्यम भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचो- दयात् || ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवी- तुवरण्यम भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचो- दयात् || ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवी- तुवरण्यम भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचो- दयात् ||
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प्रधान की लेखनी से

संस्कारित शिक्षा की संभावनाओं में राह तलाशना अनेक समस्याओं के समाधान को संभव बनाता है। मैं इसी विश्वास को लेकर अग्रसर हूँ। शिक्षा के क्षेत्र में उच्च जीवन-मूल्यों, महत्वाकांक्षाओं, आस्थाओं तथा संकल्पों का होना अनिवार्य है। जब हम सार्वजनिक जीवन में उतरते हैं, तो सपने एकल नहीं, बल्कि सामाजिक हो जाते हैं। जब हम इस बात को जीवन में आत्मसात् कर आगे बढ़ते हैं, तो चुनौतियाँ आसान हो जाती हैं। 

वर्ष 2003 में जब मैं गुरुकुल कुरुक्षेत्र की प्रबंधकत्र्री समिति का प्रधान बना, तब मेरे सामने गुरुकुल कुरुक्षेत्र के परीक्षा परिणामों को उबारने की सबसे बड़ी चुनौती थी, जिसे साकार करने में मैं तन-मन से जुट गया। फिर परिस्थितियाँ चाहे कैसी भी क्यों न हो? परिस्थितियों से ही संभावनाएँ निकली और अपार सफलता मिली। आज मैं जिन सपनों को देखता हूँ, वे मुझे सोने नहीं देते। मेरा सपना है कि गुरुकुल कुरुक्षेत्र के विद्यार्थी पूरे भारत में सी.बी.एस.ई. परीक्षाओं में शीर्ष स्थान (टाॅप) पर हो। फिलहाल कुछ कदम की दूरी है।

मेरे पास अनेक अभिभावक गुरुकुल कुरुक्षेत्र में अपने बच्चों को प्रविष्ट कराने में असमर्थ होने पर समस्याएँ लेकर आते हैं। बहुत से मामलों में मेरी पहली सोच होती है कि छात्रावास में स्थानाभाव के कारण यह संभव नहीं है। मैं फिर अभिभावकों का मुरझाया हुआ चेहरा देखता हूँ तो सोचता हूँ, ये मुझे सक्षम मानकर आए हैं। शायद मेरा प्रयास और सामने वाले अभिभावकों का भाग्य कोई रास्ता निकाल दे। मैं उन अभिभावकों के सुझाव-पत्र संभाल कर प्रयत्न करने में जुट जाता हूँ। सच मानिए ऐसे मामलों में मुझे काफी हद तक सफलता मिली है, जिसका प्रतिफल है कि आज अनेक नवीन छात्रावासों व भवनों का जाल सा बिछा हुआ है। 

इस वर्ष 8000 नवप्रविष्ट प्रवेशार्थियों का अपार जन सैलाब उमड़ा जो गुरुकुल कुरुक्षेत्र में प्रदान की जा रही संस्कारित शिक्षा की सार्थकता को प्रमाणित करता है कि गुरुकुल शिक्षा समाज में कितनी लोकप्रिय है। कहते हैं कि सपने सतरंगी होते हैं, मेरे सपने तो अनेकानेक रंगों के हैं। नित एक नया सपना जुडता है, हर सपने के साथ एक नए प्रयास की गाथा आरंभ होती है। आज गुरुकुल में शिक्षा, चिकित्सा, देशी गाय नस्ल सुधार, आयुर्वेदिक दवा निर्माण हेतु फार्मेसी, जैविक कृषि व समाज सेवा व जन जागरण के क्षेत्र में अनेक प्रकल्प चल रहे हैं। 

ईश्वर ने सृष्टि की रचना कर्म के लिए की है, क्यांेकि जीवन मंे कर्म की प्रधानता है। कर्म ही हमारे जीवन का मार्ग प्रशस्त कर गति और लक्ष्य को निर्धारित करते हैं। इसलिए हम हर कार्य को कत्र्तव्य समझकर कर रहे हैं, स्वार्थ पूर्ति के लिए नहीं, बल्कि लोक कल्याण के लिए समर्पित है। यह संसार कर्मभूमि है। कर्मवीर ही जीवन में सफल होते हैं तथा जीवन में यश-कीर्ति को प्राप्त करते हैं। इसी लक्ष्य को लेकर गुरुकुल कुरुक्षेत्र कार्य कर रहा है और सदैव करता रहेगा। 

गुरुकुल कुरुक्षेत्र में जो उन्नति और विकास दिखाई दे रहा है, उसके पीछे हिमाचल प्रदेश के महामहिम राज्यपाल व गुरुकुल कुरुक्षेत्र के संरक्षक श्री आचार्य देवव्रत जी, शिक्षकगण व कर्मचारियों की श्रम साधना, पुरुषार्थ व संकल्पशक्ति है। 

यही गुरुकुल कुरुक्षेत्र के निर्माण की मूल अवधारणा है। मुझे खुशी है कि मेरे सपने भी इसी अवधारणा में रचे-बसे व गुंथे हुए आगे बढ़ रहे हैं। 

कुलवन्त सिंह सैनी, प्रधान
गुरुकुल प्रंबधकत्र्री समिति,
कुरुक्षेत्र (हरियाणा)
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